Goswami Tulsidas : तुलसीदास का जीवन परिचय, रचनाएँ- Best Page For Exam-1

Tulsidas : तुलसीदास का जीवन परिचय, रचनाएँ: तुलसीदास भारत के एक प्रसिद्ध कवि और संत थे, जिन्होंने हिंदी और अवधी भाषाओं में कई भक्ति रचनाएँ लिखीं। उनका जन्म 16वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के राजापुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही भगवान राम के प्रति समर्पित थे और पांच साल की उम्र में उन्हें उनके दर्शन हुए।

उन्होंने एक भ्रमणशील संन्यासी बनने के लिए अपना घर और परिवार छोड़ दिया और विभिन्न गुरुओं के अधीन अध्ययन किया। उन्होंने कई पवित्र स्थानों का भी दौरा किया और कई साधु-संतों से मुलाकात की। तुलसीदास को उनके महाकाव्य रामचरितमानस के लिए जाना जाता है, जो आम लोगों की स्थानीय भाषा में रामायण का पुनर्कथन है। उन्होंने इसकी रचना वाराणसी में की, जहाँ उन्होंने अपना अधिकांश जीवन बिताया।

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उन्होंने विनय पत्रिका, गीतावली, दोहावली, हनुमान चालीसा और कवितावली जैसी अन्य रचनाएँ भी लिखीं। उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य के रत्न माने जाते हैं और उन्होंने कवियों और लेखकों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। उनकी रचनाएँ राम के प्रति सर्वोच्च वास्तविकता के रूप में भक्ति, या प्रेमपूर्ण भक्ति के दर्शन को भी व्यक्त करती हैं।

तुलसीदास हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए पूजनीय थे और सम्राट अकबर, बीरबल, तानसेन और गुरु नानक जैसी कई प्रतिष्ठित हस्तियां उनसे मिलने आती थीं। उन्होंने वाराणसी में हनुमान को समर्पित संकटमोचन मंदिर की भी स्थापना की। 1623 में 91 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी विरासत लाखों भक्तों के दिलों में जीवित है जो उनकी प्रशंसा करते हैं और उनकी शिक्षाओं का पालन करते हैं।

 

गोस्वामी तुलसीदास(Goswami Tulsidas)

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तुलसीदास का जीवन परिचय :

(Goswami Tulsidas) हिन्दी के भक्तिकाल की सगुण धारा के राम भक्त कवि हैं। ‘मूल गोसाईं चरित’ के आधार पर इनके जीवन की प्रमुख बातें इस प्रकार से है तुलसी का जन्म सं. 1554 वि. में श्रावण शुक्ला सप्तमी को राजापुर में हुआ था।

पंद्रह सौ चौवन विषे कालिंदी के तीर ।

श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरे सरीर ॥

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तुलसीदास का जीवन परिचय: इनके पिता राजापुर के राजगुरु थे। इनकी माता का नाम हुलसी था। प्रसिद्धि है कि जन्म के समय रोये नहीं, वरनू राम राम का उच्चारण किया, जिससे इनका नाम रामबोला पड़ गया। उनके बत्तीसों दांत थे। ये पांच वर्ष बालक जैसे उत्पन्न हुए थे। जन्म के तीन दिन बाद इनकी माता का देहान्त हो गया। माता ने पुत्र की रक्षा का भार अपनी दासी चुनिया को सौंप दिया था। अतः हुलसी की मृत्यु के बाद वह रामबोला को अपनी ससुराल हरिपुर ले गई। वहाँ पर उसकी मृत्यु सांप के काटने पर हो गई । वहाँ से राजापुर पिता के पास संदेश आया, पर उन्होंने बालक को अमंगलकारी जानकर वापस बुलाया ही नहीं।

पांच वर्ष का बालक रामबोला द्वार-द्वार भीख मांगने लगा । अनंतानंद के शिष्य नरहर्यानन्द ने सब संस्कार करके शूकर क्षेत्र में इन्हें राम की कथा सुनाई। उन्होंने रामबोला का तुलसी नाम रखा । पांच वर्ष के बाद नरहरि उन्हें लेकर काशी आए और वहाँ शेष सनातन से मिले। शेष सनातन तुलसी की प्रतिभा पर चकित रह गए और उनके संरक्षण में उन्होंने इतिहास, पुराण और काव्य सब पह डाला । शेष सनातन की मृत्यु के उपरान्त तुलसी राजापुर आए और वहाँ रामकथा कह कर अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

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पूरा नाम गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulasidas)
बचपन का नाम रामबोला
उपनाम गोस्वामी, अभिनववाल्मीकि, इत्यादि
जन्मतिथि 1511 ई० (सम्वत्- 1568 वि०)
उम्र मृत्यु के समय 112 वर्ष
जन्म स्थान सोरों शूकरक्षेत्र, कासगंज , उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु 1623 ई० (संवत 1680 वि०)
मृत्यु का स्थान वाराणसी, उत्तर प्रदेश
गुरु / शिक्षक नरसिंहदास
धर्म हिन्दू
दर्शन वैष्णव
तुलसीदास जी प्रसिद्ध कथन सीयराममय सब जग जानी।
करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी ॥
(रामचरितमानस १.८.२)
प्रसिद्ध साहित्यिक रचनायें रामचरितमानस, विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, वैराग्य सन्दीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, इत्यादि
पिता का नाम  आत्माराम शुक्ल दुबे
माँ का नाम हुलसी दुबे
पत्नी का नाम बुद्धिमती (रत्नावली)
बच्चो के नाम  बेटा  – तारक
शैशवावस्था में ही निधन

हिन्दी साहित्य के बृहत् इतिहास के अनुसार सं. 1583 में तारपिता गाँव के ब्राहमण ने तुलसी का विवाह अपनी कन्या से कर दिया। पांच वर्ष वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के बाद उनकी स्त्री एक बार मैके चली गई । वे स्वयं उनके पीछे ससुराल गए और उनकी चेतावनी पर वैराग्य ग्रहण किया।

इस दुःख में उनकी पत्नी की सं. 1689 में मृत्यु हो गई । तुलसी ने घर से निकल कर 15 वर्ष तक तीर्थ यात्रा और भ्रमण कर अंत में चित्रकूट में अपना निवासस्थान बनाया । वहाँ हनुमान के द्वारा राम दर्शन हुए। इसके बाद वे काशी चले गए। काशी में शिव ने दर्शन देकर इन्हें राम कथा लिखने की प्रेरणा दी। फलस्वरूप सं. 1631 में अयोध्या आकर इन्होंने रामचरित मानस की रचना प्रारंभ की।

रामचरित मानस की ख्याति बढ़ गई, फलतः काशी के पंडितों ने उसे द्वेषवश चुराने का प्रयत्न किया, और तुलसी ने यह प्रति काशी के जमींदार टोडर के यहाँ सुरक्षित रखवाई। काशी के पंडितों द्वारा पीड़ित होने पर सं. 1633 तक इन्होंने विनय पत्रिका लिखी । इसके बाद इन्होंने मिथिला यात्रा की। इसी समय के लगभग रामलला नहछू, पार्वती मंगल और जानकी मंगल की रचना की। सं. 1640 में दोहावली संग्रह लिखा । उन्होंने जीवन में अनेक चमत्कार दिखाए। इस बीच इन्होंने अन्य ग्रंथों की रचना की। संवत् 1680 में श्रावण तीज शनिवार को गंगा के किनारे असी घाट पर लुलसी ने शरीर छोड़ा।

संवत् सोरह सौ असी असी गंग के तीर ।

श्रावणस्यामा तीज सनि, तुलसी तजे सरीर ॥

तुलसी की यह मृत्यु तिथि सर्वमान्य है, यद्यपि जन्मतिथि के बारे में मतभेद है, जार्ज ग्रियर्सन ने घटरामायण के आधार पर सं. 1589 तिथि मानी है जो डॉ. माताप्रसाद गुप्त को भी मान्य है क्योंकि यह गणना शुद्ध उतरती है, पर यह भादो सुदी 1, मंगलवार है। इस तिथि की परंपरा का कोई प्रमाण नहीं । यह तो घटरामायण की कल्पना मात्र है। अधिक मान्य तो मूल गोसाई चरित की तिथि सं. 1554 सावन शुक्ला 6 होनी चाहिए क्योंकि इसकी परंपरा है। मानस मयंक’ के लेखक ने भी इसे स्वीकार किया है। इस तिथि को ही तुलसी का जन्म समय समझना चाहिए; मतभेद होने पर भी तिथि सर्वमान्य है।

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रचनाएँ :

तुलसी (Goswami Tulsidas) के बारह ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं, जिनमें पांच ग्रंथ अति प्रसिद्ध हैं रामचरित मानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली और दोहावली । इनके अतिरिक्त सात ग्रंथ और भी हैं। पार्वती मंगल, जानकी मंगल, वैराग्य संदीपनी, कृष्णगीतावली, बरवै रामायण, रामलला नहछू, रामाज्ञा प्रश्नावली । इनमें से चार ग्रंथ इस पाठ्यक्रम में हैं जिनकी विशेष चर्चा की जाएगी । यहाँ संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है ।

 

रचनाओं का संक्षिप्त परिचय :

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रामचरित मानस –

यह अवधी में रचित रामकथा पर आधृत महाकाव्य है । इसकी रचना 1574 ई. में अयोध्या में आरंभ हुई तथा इसका अंतिमभाग काशी में समाप्त हुआ । यह सात काण्डों का प्रबंध काव्य है। भारत के अधिकांश प्रांतों में तथा उत्तर भारत में इस ग्रंथ को अधिक से अधिक लोग पढ़ते हैं । वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत की तुलना में इस ग्रंथ के प्रति अधिक लोग आकर्षित हैं। इसमें लोग अपने जीवन का प्रतिबिम्ब देख पाते हैं ।

रचनायें प्रकाशित वर्ष
रामचरितमानस 1574 ईस्वी
रामललानहछू 1582 ईस्वी
वैराग्यसंदीपनी 1612 ईस्वी
सतसई
बरवै रामायण 1612 ईस्वी
हनुमान बाहुक
कविता वली 1612 ईस्वी
गीतावली
श्रीकृष्णा गीतावली 1571 ईस्वी
पार्वती-मंगल 1582 ईस्वी
जानकी-मंगल 1582 ईस्वी
रामाज्ञाप्रश्न
दोहावली 1583 ईस्वी
विनय पत्रिका 1582 ईस्वी

गीतावली –

इसमें रामकथा संबंधी पदावली है। काण्ड ग्राम से यह संकलित है। सूरसागर के अनुकरण पर इसकी रचना हुई है। गीतों में कक्षा की पुनरावृति दिखाई पड़ती है।

विनय पत्रिका –

विनय पत्रिका में 229 पद है। यह राम के चरणों में भेजी जाने वाली। गीतात्मक अर्जी के रूप में प्रस्तुत है। इसमें तुलसी की साधना का आदर्श, कला तथा भावनाओं का सहज सौन्दर्य दर्शनीय है। यह रचना सर्वश्रेष्ठ आत्मनिवेदनात्मक साहित्य रूप है। इसका प्रत्येक पदभक्ति रस से ओतप्रोत है।

कवितावली –

इसमें राम कथा संबंधी पदावली के साथ कवि के जीवन तथा युग को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्रसंगों की अवरतारणा हुई है। महामारी, शरीर पोहा तथा मृत्यु से पहले का कष्ट वर्णित है। इसमें कविता सवैया शैली में वर्णित है ।

इन चार ग्रंथों के अलावा अन्य ग्रंथों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

रामाज्ञा प्रश्न –

सात सर्गों में यह रचना है जिसमें कुल 343 पद है। इसमें पूरी राम कथा प्रस्तुत की गई है। इसमें सीता की धरती प्रवेश कथा वर्णित है ।

रामलला नहछू –

इसमें राम विवाह के अवसर का गीत है। इस में ‘राम विवाह के अवसर पर उपस्थित प्रजाजनों के हाव-भाव का सुन्दर वर्णन है। इसकी भाषा अवधी है।

पार्वती मंगल –

इसमें राम कथा संबंधी पदावलियाँ है। इसका रचनाकाल 1643 वि. है । इसमें शिवपार्वती के विवाह का क्रमबद्ध वर्णन है। अतः यह एक खण्डकाव्य है। यह मंगल काव्य या विवाह काव्य है।

जानकी मंगल –

इसका रचनाकाल 1643 वि. है। इसमें भी राम-सीता का विवाह धारावाहिक रूप में है। वाल्मीकि रामायण के अनुकूल इसका वर्णन है। इसकी भाषा अवधी है।

दोहावली –

समय समय पर लिखे गए दोहों का संग्रह है। इसका रचना काल 1626 सं. से लेकर सं. 1680 तक माना जाता है। मुक्त काव्य की सफलता इसमें देखी जा सकती है। यह ब्रजभाषा की एक सफल कृति है।

बरवै रामायण –

सं. 1669 इसका रचनाकाल है। यह कवि के द्वारा समय समय पर गए छंदों का संग्रहमा है। इसमें भक्तिरस से संबंधित पद है। इसकी भाषा अवधी है। वैराग्य संदीपनी कुल बासठ छंटो की छोटीसी रचना है। इसे मुक्त काव्य कहा जाता है। इसमें शांतरस प्रमुख है। इसमें निर्गुण और सगुण की एकता प्रतिपादित है। इसकी भाषा ब्रजावधी है।

कृष्णगीतावली –

यह पदों का संग्रह है। यह ग्रंथ में 1643 और 1650 के बीच में निर्धारित किया गया इसका रचनाकाल है। इसमें वात्सल्य एवं शृंगार दोनों रसों का प्राधान्य है। कवि 61 पदों में कृष्ण के बाल लीला का गान किया है। इसकी भाषा है।

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