द्वैताद्वैत वाद / भेदाभेदवाद क्या है (Dvaitadvaita)- अर्थ, प्रवर्तक, सिद्धान्त और निम्बार्क संप्रदाय | WikiFilmia- No. 1 Website

द्वैताद्वैतवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जो द्वैत और अद्वैत दोनों को मानता है। द्वैताद्वैत का अर्थ है द्वैत और अद्वैत दोनों का समन्वय। द्वैताद्वैतवाद के अनुसार, ब्रह्मांड ईश्वर  से भिन्न है, किन्तु यह ब्रह्म का एक हिस्सा भी है। द्वैताद्वैतवाद के प्रणेता निम्बार्क आचार्य हैं।
द्वैताद्वैतवाद को “भेद-अभेदवाद”(भेदाभेदवाद) भी कहा जाता है। द्वैताद्वैतवाद की मुख्य विशेषता यह है कि यह ब्रह्म , जीव और जगत् के बीच भेदाभेद को सिद्ध करता है। द्वैताद्वैतवाद द्वैत और अद्वैत दोनों को समान रूप से प्रतिष्ठित करता है।

द्वैताद्वैत वाद का अर्थ-

द्वैताद्वैत वाद एक ऐसा दर्शन है जो ब्रह्म, जीव और जगत के मध्य भेदाभेद सिद्ध करता है। इसके अनुसार, ब्रह्म, जीव और जगत एक ही सत्ता के विभिन्न प्रकाश हैं, परन्तु उनमें परस्पर का सम्बन्ध स्वाभाविक है, न कि कल्पित। इसके प्रणेता निम्बार्क (Nimbarka) हैं, जिनके मुताबिक, ब्रह्म सगुण है, जो कि कृष्ण-राधा के समान हैं। जीव ब्रह्म के सहचर हैं, परन्तु माया के कारण उनसे पृथक् होते हैं। मोक्ष का साधन भक्ति है, जो कि प्रेम, सेवा, समर्पण, संघर्ष, समरसता, समीपता, सायुज्य में परिणत होती है।

द्वैताद्वैत वाद को भेदाभेदवाद (Bhedabheda) के नाम से भी जाना जाता है।

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द्वैताद्वैतवाद एक भारतीय दर्शन है जो ब्रह्म, जीव और जगत् के बीच भेद और अभाव दोनों को स्वीकार करता है। इसे भेदाभेदवाद भी कहा जाता है। इस दर्शन के प्रवर्तक निम्बार्काचार्य थे।

निम्बार्काचार्य के अनुसार, ब्रह्म (परमात्मा) और जीव (आत्मा) दो अलग-अलग सत्ताएँ हैं, लेकिन वे एक दूसरे से अभिन्न भी हैं। ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है, जिससे जगत् की उत्पत्ति होती है। जीव जगत् का निमित्त कारण है, जो जगत् को संचालित करता है।

निम्बार्काचार्य के अनुसार, ब्रह्म और जीव की समानता इस बात में है कि दोनों ही चेतन हैं और दोनों ही आनंद का अनुभव करते हैं। लेकिन उनमें अंतर इस बात में है कि ब्रह्म पूर्ण चेतन है और पूर्ण आनंद का अनुभव करता है, जबकि जीव अपूर्ण चेतन है और अपूर्ण आनंद का अनुभव करता है।

द्वैताद्वैतवाद दर्शन के अनुसार, जीव को मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म के साथ एकरूप होना चाहिए। यह एकरूपता भक्ति और ज्ञान के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

द्वैताद्वैतवाद दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि ब्रह्म सबमें व्याप्त है। यह सिद्धांत ब्रह्म और जीव के बीच के भेद को कम करता है। इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्म से अलग कुछ भी नहीं है।

द्वैताद्वैतवाद दर्शन भारतीय दर्शन के एक प्रमुख दर्शन है। यह दर्शन आज भी कई लोगों द्वारा माना जाता है।

Here are some of the key concepts of Dvaitadvaita philosophy:

  • Brahman (Supreme Being) and jiva (soul) are two distinct entities, but they are also one in essence.
  • Brahman is the material cause of the world, while jiva is the efficient cause.
  • Brahman and jiva are both conscious and experience bliss. However, Brahman is fully conscious and experiences perfect bliss, while jiva is partially conscious and experiences imperfect bliss.
  • Liberation (moksha) can be attained by jiva through bhakti (devotion) and jnana (knowledge).
  • Brahman is all-pervading.

Dvaitadvaita philosophy is a complex and sophisticated philosophy that has been the subject of much debate and discussion. It is a significant contribution to the study of Indian philosophy.

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द्वैताद्वैत वाद के प्रमुख सिद्धान्त

  • इसके अनुसार, ब्रह्म, जीव और जगत एक ही सत्ता के विभिन्न आयाम हैं, परन्तु उनमें परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है, न कि कल्पित।
  • ब्रह्म को सगुण मानना, जो कि कृष्ण-राधा के समान हैं।
  • जीव को ब्रह्म का सहचर मानना, परन्तु माया के कारण उनसे पृथक् होते हैं।
  • मोक्ष का साधन भक्ति है, जो कि प्रेम, सेवा, समर्पण, संघर्ष, समरसता, समीपता, सायुज्य में परिणत होती है।
  • पंचभेद का सिद्धान्त, जो कि परमात्मा-जीव, परमात्मा-जड़, जीव-जड़, जीव-जीव, और जड़-जड़ के मध्य नित्य भेदों को मानता है।

निम्बार्क संप्रदाय

निम्बार्क संप्रदाय, द्वैताद्वैत दर्शन का अनुसरण करने वाला एक भारतीय धार्मिक संप्रदाय है। इस संप्रदाय के प्रवर्तक निम्बार्काचार्य थे, जो बारहवीं शताब्दी के एक दार्शनिक और धर्मगुरु थे।

निम्बार्काचार्य का जन्म ११३५ ईस्वी में जयपुर के पास नदौती नामक स्थान पर हुआ था। उन्होंने वेदों, उपनिषदों और गीता का गहन अध्ययन किया और एक शक्तिशाली दार्शनिक के रूप में उभरे। उन्होंने द्वैताद्वैत दर्शन की स्थापना की, जो ब्रह्म, जीव और जगत् के बीच भेद और अभाव दोनों को स्वीकार करता है।

निम्बार्काचार्य ने कई ग्रंथों की रचना की, जिनमें वेदांत पारिजात, वेदांतकामधेनु दशश्लोकी, रहस्यषोडशी और प्रपत्तिचिंतामणी प्रमुख हैं। उन्होंने अपने अनुयायियों को गीता और ब्रह्मसूत्र के अध्ययन पर जोर दिया।

निम्बार्काचार्य के प्रमुख शिष्यों में श्रीनिवासाचार्य, गोविंदाचार्य और मधुसूदनाचार्य शामिल हैं। इन शिष्यों ने निम्बार्काचार्य के विचारों का प्रचार और प्रसार किया और निम्बार्क संप्रदाय का विस्तार किया।

निम्बार्क संप्रदाय का मुख्य केंद्र राजस्थान का वृंदावन है। इस संप्रदाय के अनुयायी भक्ति और ज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। वे राधा-कृष्ण की भक्ति में विशेष रूप से विश्वास रखते हैं।

निम्बार्क संप्रदाय के कुछ प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  • ब्रह्म, जीव और जगत् तीन अलग-अलग सत्ताएँ हैं, लेकिन वे एक दूसरे से अभिन्न भी हैं।
  • ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है, जिससे जगत् की उत्पत्ति होती है। जीव जगत् का निमित्त कारण है, जो जगत् को संचालित करता है।
  • ब्रह्म और जीव दोनों ही चेतन हैं और दोनों ही आनंद का अनुभव करते हैं। लेकिन उनमें अंतर इस बात में है कि ब्रह्म पूर्ण चेतन है और पूर्ण आनंद का अनुभव करता है, जबकि जीव अपूर्ण चेतन है और अपूर्ण आनंद का अनुभव करता है।
  • जीव को मोक्ष प्राप्त करने के लिए ब्रह्म के साथ एकरूप होना चाहिए। यह एकरूपता भक्ति और ज्ञान के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।
  • ब्रह्म सबमें व्याप्त है। यह सिद्धांत ब्रह्म और जीव के बीच के भेद को कम करता है। इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्म से अलग कुछ भी नहीं है।

निम्बार्क संप्रदाय भारतीय दर्शन और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह संप्रदाय आज भी कई लोगों द्वारा माना जाता है।

Source:-

https://hi.wikipedia.org/

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