विशिष्टाद्वैत वाद क्या है- विशिष्टाद्वैत का अर्थ, इतिहास एवं प्रमुख सिद्धांत- WikiFilmia | No. 1 Website

विशिष्टाद्वैतवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जिसे  रामानुजाचार्य (1017-1137 ई.) ने स्थापित किया था। विशिष्टाद्वैत का तात्पर्य है “विशिष्ट+अद्वैत”। इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड और आत्मा ब्रह्म से अलग हैं, लेकिन वे ब्रह्म से ही उपजे हुए हैं तथा ब्रह्म से उसी तरह संबंधित हैं- जैसे सूर्य से उसकी किरणें। इसलिए ब्रह्म एक होने पर भी अनेक हैं।
विशिष्टाद्वैत में, भक्ति मोक्ष का एकमात्र माध्यम है। भक्ति के माध्यम से, एक जीव वैकुंठ में चला जाता है, जहां वह सत्-चित-आनंद शरीर में उनकी सेवा में खुश रहता है। कर्म योग और ज्ञान योग भक्ति की उप-प्रक्रियाएं हैं।
विशिष्टाद्वैत में तीन तत्वों को हमेशा माना गया है – 1. ईश्वर (ब्रह्म),2. जीव (आत्मा), 3. प्रकृति।

विशिष्टाद्वैत का अर्थ-

विशिष्टाद्वैतवाद एक भारतीय दर्शनिक मत है, जिसके प्रतिपादक रामानुजाचार्य थे। इस मत के अनुसार, ब्रह्म, जगत और जीव तीन सत्य हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक् नहीं हैं। ब्रह्म सगुण, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वानन्दमय, सर्वनियामक और सर्वोपासनीय है। ब्रह्म का संबंध जगत और जीवों से शरीर-आत्मा के समान है, अर्थात् ब्रह्म ही समस्त प्रपंच का शरीर है, और प्रपंच ही ब्रह्म का प्रकाश है।

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इस मत का मुख्य सिद्धांत है कि मोक्ष के लिए केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्म, प्रेम, प्रपत्ति (समर्पण) और भक्ति का समन्वय होना चाहिए। मोक्ष का अर्थ है परमात्मा के समीप पहुंचना, परमानन्द का प्राप्ति करना, पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति पाना, परमात्मा की सेवा में मगन होना, परमात्मा के सुंदर, महिमामय, प्रेममय, कल्याणकारी, सहृदय, सहानुभूति-समुन्‍नत, मुक्‍त-पुरुषों-से-पूरित-लोक में स्‍थिर होना।

वेदान्त और विशिष्टाद्वैत में अंतर-

वेदान्त और विशिष्टाद्वैत में अंतर जानने के लिए, हमें पहले इन दोनों शब्दों का अर्थ समझना होगा।

वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है “वेदों का अन्त” या “वेदों का सार”। यह एक भारतीय दर्शनिक मत है, जिसका मुख्य स्रोत उपनिषद हैं, जो वेदों के अंतिम भाग में पाए जाते हैं। उपनिषदों में मुख्यतः ब्रह्म, जीव, प्रकृति, मोक्ष, कर्म, माया, आत्मा, परमात्मा, सत्-चित्-आनन्द, साक्षी आदि तत्व शामिल होते है।

वेदांत हिंदू धर्म की एक शाखा है जो उपनिषदों और अन्य वैदिक ग्रंथों पर आधारित है। वेदांत के कई अलग-अलग स्कूल हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने स्वयं के सिद्धांतों और मान्यताओं को प्रदर्शित करता है।

विशिष्ट अद्वैतवाद वेदांत के एक स्कूल है जिसे आचार्य रामानुज ने 11वीं शताब्दी में स्थापित किया था। विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार, ब्रह्म सर्वोच्च वास्तविकता है, लेकिन यह जगत और जीवात्मा के साथ भी जुड़ा हुआ है। ब्रह्म जगत और जीवात्मा का कारण है, और वे ब्रह्म के गुण हैं। जगत और जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न हैं, लेकिन वे ब्रह्म से स्वतंत्र भी नहीं हैं।

अद्वैतवाद वेदांत का एक और स्कूल है जिसे शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में स्थापित किया था। अद्वैतवाद के अनुसार, ब्रह्म एकमात्र वास्तविकता है, और जगत और जीवात्मा भ्रम के रूप में हैं। जगत और जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न हैं, और वे ब्रह्म से स्वतंत्र हैं।

विशिष्ट अद्वैतवाद और अद्वैतवाद के बीच कुछ प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं:

  • ब्रह्म की प्रकृति: विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार, ब्रह्म एकमात्र वास्तविकता है, लेकिन यह जगत और जीवात्मा के साथ भी जुड़ा हुआ है। अद्वैतवाद के अनुसार, ब्रह्म एकमात्र वास्तविकता है, और जगत और जीवात्मा भ्रम के रूप में हैं।
  • जगत की प्रकृति: विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार, जगत ब्रह्म का गुण है, लेकिन यह ब्रह्म से भिन्न है। अद्वैतवाद के अनुसार, जगत ब्रह्म से स्वतंत्र है।
  • जीव की प्रकृति: विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार, जीव ब्रह्म का अंश है, लेकिन यह ब्रह्म से भिन्न है। अद्वैतवाद के अनुसार, जीव ब्रह्म से स्वतंत्र है।
  • मोक्ष: विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार, मुक्ति प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को ब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करनी चाहिए। यह भक्ति और ज्ञान के माध्यम से किया जा सकता है। अद्वैतवाद के अनुसार, मुक्ति प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को अज्ञान को दूर करना चाहिए और ब्रह्म को पहचानना चाहिए।

कुल मिलाकर, विशिष्टाद्वैतवाद और अद्वैतवाद दोनों ही वेदांत के महत्वपूर्ण स्कूल हैं। वे ब्रह्म की प्रकृति, जगत की प्रकृति, जीव की प्रकृति और मोक्ष के बारे में अलग-अलग विचार रखते हैं।

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विशिष्टाद्वैत वाद का इतिहास-

विशिष्टाद्वैतवाद, जिसे “विशिष्ट अद्वैतवाद” या “विशिष्ट एकतावाद” भी कहा जाता है, हिंदू दर्शन की एक शाखा है जो ब्रह्म को सर्वोच्च वास्तविकता मानती है, लेकिन इसके साथ ही जगत और जीवात्मा की विशिष्टताओं को भी मान्यता देती है। इसे “विशिष्ट नैतिकता” या “विशिष्ट एकता” भी कहा जाता है।

विशिष्ट अद्वैतवाद का जन्म 11वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में हुआ था। इसकी स्थापना आचार्य रामानुज ने की थी, जिन्हें दक्षिण भारत के सबसे महान दार्शनिकों में से एक माना जाता है। रामानुज ने अपने पूर्ववर्ती, शंकराचार्य के अद्वैतवाद के सिद्धांत का खंडन किया, जो ब्रह्म को एकमात्र वास्तविकता मानते थे और जगत और जीवात्मा को भ्रम के रूप में देखते थे।

विशिष्ट अद्वैतवाद के अनुसार, ब्रह्म सर्वोच्च वास्तविकता है, लेकिन यह जगत और जीवात्मा के साथ भी जुड़ा हुआ है। ब्रह्म जगत और जीवात्मा का कारण है, और वे ब्रह्म के गुण हैं। जगत और जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न हैं, लेकिन वे ब्रह्म से स्वतंत्र भी नहीं हैं।

विशिष्ट अद्वैतवाद का मानना है कि मुक्ति प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को ब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करनी चाहिए। यह भक्ति और ज्ञान के माध्यम से किया जा सकता है।

विशिष्टाद्वैत वाद के प्रमुख सिद्धांत-

विशिष्ट अद्वैतवाद के कुछ प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  • ब्रह्म सर्वोच्च वास्तविकता है।
  • जगत और जीवात्मा ब्रह्म के गुण हैं।
  • जगत और जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न हैं, लेकिन वे ब्रह्म से स्वतंत्र भी नहीं हैं।
  • मुक्ति प्राप्त करने के लिए, मनुष्य को ब्रह्म के साथ एकता प्राप्त करनी चाहिए।

विशिष्ट अद्वैतवाद हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय में सबसे लोकप्रिय दर्शन है। यह दक्षिण भारत में विशेष रूप से व्यापक है।

Source:-

https://bharatdiscovery.org/

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