आदिकाल: हिन्दी साहित्य का इतिहास- सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य | Aadikal: Hindi Sahitya ka Itihas | Best Page-1

हिन्दी साहित्य का प्रारंभिक दौर आदिकाल कहलाता है। हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल की रचनाएँ साहित्य के विकास को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। परंतु अधिकांश आदिकालीन ग्रंथों का उपलब्ध न होना, प्रमाणिकता में संदेह, कालनिर्धारण में सामंजस्य न होना आदि कठिनाईयों के बावजूद साहित्य के विद्वानों और आचार्यों द्वारा व्यवस्थित धारणा बनाना बहुत ही कुशलता का काम है।

हिन्दी साहित्य का सबसे विवादग्रस्त काल, वीरगाथा काल, चारणकाल, सिद्ध सामन्त युग, बीजवपन काल, वीरकाल आदि नामों से जाना जाता है। उस काल में संस्कृत के बड़े-बड़े कवि पैदा हुए, जिनकी रचनाएँ संस्कृत काव्य परम्परा की सीमा पार कर गईं; दूसरी ओर अपभ्रंश के कवि पैदा हुए, जो अपने मार्मिक भावों को बहुत छोटे-छोटे शब्दों में व्यक्त कर रहे थे।

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Hindi Sahitya Ka Itihas pdf | हिंदी साहित्य का इतिहास : काल विभाजन, नामकरण, प्रवृत्तियाँ | Best Page Part-1

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Aadikal/आदिकालीन साहित्य

वास्तव में, इस काल में सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य का निर्माण हुआ, जो धर्माश्रय से फलता-फूलता रहा, वहीं राजस्थान के चारण कवियों ने चरित काव्य लिखा, जो राजा की कृपा से प्रशंसित हुआ। किंतु इस काल में लोक साहित्य भी बनाया गया, जो इन दोनों काव्य धाराओं से अलग था। वह लोकाश्रित रहने से बच नहीं सका। यह साहित्य कई कारणों से लुप्त हो गया, लेकिन यह स्पष्ट है कि प्रारंभिक काल में लोक साहित्य भी लोकप्रिय था। उपयुक्त आदिकालीन साहित्य को प्रवृत्तियों के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों में रखा जा सकता है:

 

sahitya akademi award 2022 | साहित्य अकादमी पुरस्कार 2022 | All Languages

आदिकालीन सिद्ध साहित्य

 

8वीं शताब्दी में सिद्धों की शक्ति भारतीय साधना के इतिहास में दिखाई देती है। माना जाता है कि बौद्ध धर्म की गंभीर विकृति ने सिद्ध परम्परा का जन्म दिया था। बुद्ध का जन्म 483 ई. पूर्व में हुआ था। जब वे निर्वाण हुए, लगभग 45 साल तक बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का व्यापक प्रचार हुआ। इस धर्म की विजय की धूम देश भर में बजती रही। बौद्ध धर्म का जन्म हिंसा और वैदिक कर्मकाण्ड की जटिलता की प्रतिक्रिया थी।

यह धर्म सहानुभूति और सदाचार के मूल तत्वों पर आधारित था, लेकिन बाद में इसके अनुयायियों में कुछ सैद्धान्तिक और साधनात्मक प्रश्नों पर मतभेद हुआ। ईसा की पहली शताब्दी में बौद्ध महायान और हिनयान दो अलग-अलग ग्रुपों में विभाजित हो गए। महायान बड़े रथों पर चलते थे, जबकि हिनयानी छोटे रथों पर चलते थे। हीनयान में सिद्धांत पक्ष का महत्व था, जबकि महायान में व्यवहारिकता का महत्व था। हीनयानी व्यक्तिगत साधना के पक्षधर थे और महायानी निर्वाण के पक्षधर थे।

महायान वाले सबको अपने रथ में बैठाकर निर्वाण तक पहुँचाने का दावा करते थे। हीनयान केवल विक्षिप्तों और सन्यासियों को आश्रय देता था। इनका जीवन साधारण था, लेकिन महायानियों ने मठों और विहारों का निर्माण किया। उसने गृहस्थों और स्त्रियों के लिए मोक्ष का रास्ता खोला। इसलिए अधिक लोग उसकी ओर आकर्षित होने लगे। स्वर्ण और सुन्दरी, से उसमें भ्रष्टाचार आ गया। जादू-टोना और मंत्राचार में वृद्धि हुई। मंत्रों के इस प्रभाव और प्रचार ने महायान यंत्रयान को जन्म दिया।

वज्रयान या सहजयान सातवीं शताब्दी के आसपास मंत्रयान से विकसित हुआ। कंचन-कामिनी के योग से मंत्रयान की लोकप्रियता बढ़ी, साथ ही व्यभिचार भी बढ़ा। धीरे-धीरे कामपरक भावनाओं को दार्शनिक और सैद्धान्तिक रूप देने की इच्छा हुई। वज्रयान पंचमकारों में फंसा हुआ था। वज्रयान का मूल आधार मद, मैथुन, मांस, मुद्रा और मंत्र था। इस प्रकार वज्रयान में यौन संबंधों की स्वच्छंन्दता बढ़ी। इसने समाज पर बुरा असर डाला। यही कारण था कि बौद्ध धर्म क्रमशः महायान, यंत्रयान, वज्रयान और अन्य रूपों में विभाजित होता गया।

तंत्र मंत्र का उपयोग करके सिद्ध होना चाहने वाले सिद्ध कहलाएंगे। ये दोनों सिद्ध वज्रयानी या सहजयानी थे। आदिकालीन सिद्ध साहित्य वक्रयानी सिद्धों ने अपने विचारों को प्रसारित करने के लिए लिखा था। 84 सिद्धों में से 23 की रचनाएँ उपलब्ध हैं। प्रत्येक सिद्ध के नाम के पीछे ‘पा’ शब्द होता है। सरहपा का प्रसिद्ध ग्रन्थ, “देहाकोश”, हिंदी के प्रथम सिद्ध कहा जाता है। इनके अलावा सिद्ध कवियों (शबरपा, लुईपा, डोंबिपा, कन्हपा, कुकुरिपा, मुंडरिपा, शांतिपा, आदि) ने भी आदिकालीन सिद्ध साहित्य को समृद्ध किया है।

इन सिद्धों ने घरेलू जीवन को प्रोत्साहित किया। इसके लिए स्त्री का भोग संसार से बचना था। जीवन के स्वाभाविक भोगों में प्रवृत्ति के कारण सिद्ध साहित्य में भोग में निर्वाण की भावना है। इन सिद्धों का सिद्धान्त पक्ष सहज मार्ग कहलाया, क्योंकि वे जीवन की प्राकृतिक प्रवृत्तियों में विश्वास करते थे।

सिद्ध प्रायः अशिक्षित और हीन जाति से जुड़े हुए थे, इसलिए उनकी साधनभूत मुद्रायें, जैसे कापाली, डोम्बी आदि, निम्न जाति की भी थीं। धर्म और आध्यात्मिकता की आड़ में, उन्होंने स्त्री का उपभोग किया, जन-जीवन को विडंबित करते हुए। कमल और कलिश योनि और शिश्न के प्रतीक मात्र है। पुस्तकीय ज्ञान से ब्रह्म साक्षात्कार में संदेह व्यक्त किया है, सभी बाह्य अनुष्ठानों और षट्दर्शन का विरोध किया है।

उसने शरीर को समस्त साधनाओं का केंद्र तथा पवित्र तीर्थ बताया है, आत्मा-परमात्मा की एकता में विश्वास व्यक्त किया है, सामरस्य भाव तथा महासुख की चर्चा की है और पाप-पुण्य दोनों को बंधन का कारण बताया है। डॉ. रामकुमार वर्मा ने प्रसिद्ध साहित्य का मूल्यांकन करते हुए लिखा-

“सिद्ध साहित्य का महत्व इस बात में बहुत अधिक है कि उससे हमारे साहित्य के आदिरूप की सामग्री प्रामाणिक ढंग से प्राप्त होती है। चारणकालीन साहित्य तो केवल मात्र तत्कालीन राजनीतिक जीवन की प्रतिच्छाया है, यह सिद्ध साहित्य शताब्दियों से आनेवाली धार्मिक और सांस्कृतिक विचारधारा का स्पष्ट रुप है। संक्षेप में जो जनता नरेशों की स्वेच्छाचारिता पराजय या पतन से त्रस्त होकर निराशावाद के गर्त में गिरी हुई थी, उसके लिए इन सिद्धों की वाणी ने संजीवनी का कार्य किया।”

 

सिद्ध साहित्य की विशेषताएँ

 

आदिकाल: हिन्दी साहित्य का इतिहास- सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य | Aadikal: Hindi Sahitya ka Itihas | Best Page-1
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हिन्दी साहित्य में प्रभाव और प्रवृत्ति के कारण सिद्ध साहित्य महत्वपूर्ण है। इन सिद्धों ने साधनापरक साहित्य लिखा, जो उनके सम्प्रदाय के सिद्धान्तों को समझाता था। इस प्रकार सिद्ध साहित्य की प्रवृत्तियाँ हैं:

जीवन की सहजता और स्वाभाविकता मे दृढ़ विश्वास

सहज मार्ग के अनुसार प्रत्येक नारी प्रज्ञा और प्रत्येक नर करूणा (उपाय) का प्रतीक है, इसलिए नर-नारी मिलन प्रज्ञा और करुणा निवृत्ति और प्रवृत्ति का मिलन हैं, दोनों को अभेदता ही ‘महासुख’ की स्थिति है।

गुरू महिमा का प्रतिपादन

सरहपा ने कहा है कि गुरु की कृपा से ही सहजानन्द की प्राप्ति होती है। गुरु के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होगा जिसने गुरूपदेश का अमृतपान नहीं किया, वह शास्त्रों की मरुभूमि में प्यास से व्याकुल होकर मर जाएगा। –

“गुरू उवएसि अमिरस धावण पीएड जे ही

बहु सत्यत्य मरूस्थलहि तिसिय मरियड ते ही ।।

बाह्याडम्बरों पाखण्ड़ों की कटु आलोचना

वर्ण व्यवस्था, ऊँच-नीच और ब्राह्मण धर्मों के कर्मकाण्डों पर प्रहार करते हुए सरहपा ने कहा है- “ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से तब पैदा हुए थे, अब तो वे भी वैसे ही पैदा होते हैं- जैसे अन्य लोग, तो फिर ब्राह्मणत्व कहाँ रहा? कहा जाता है कि संस्कारों से ब्राह्मणत्व होता है तो चाण्डाल को अच्छे संस्कार देकर ब्राह्मण, ब्राह्मण को नंदी बना देते? यदि आग में घी डालने से मुक्ति मिलती है तो सबको क्यों नहीं डालने देते? होम करने से मुक्ति मिलती है यह पता नहीं, लेकिन धुआँ लगने से आँखों को कष्ट जरूर होता है।”

दिगम्बर साधुओं को लक्ष्य करते हुए सरहपा कहते हैं कि “यदि नंगे रहने से मुक्ति हो जाए तो सियार कुत्तों को भी मुक्ति अवश्य होनी चाहिए। केश बढ़ाने से यदि मुक्ति हो सके तो मयुर उसके सबसे बड़े अधिकारी है। यदि कंद भोजन से मुक्ति हो तो हाथी, घोड़ों को मुक्ति पहले होनी चाहिए।” इसत रह इन सिद्धों ने वेद, पुराण और पण्ड़ितों की कटु आलोचना की हैं।

तत्कालीन जीवन में आशावादी संचार

सिद्ध साहित्य का मुल्यांकन करते हुए डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने लिखा है- “जो जनता नरेशों की स्वैच्छाचारिता, पराजय या पतन से त्रस्त होकर निराशावाद के गर्त में गिरी हुई थी, उसके लिए इन सिद्धों की वाणी ने संजीवनी का कार्य किया। जीवन की भयानक वास्तविकता की अग्नि से निकालकर मनुष्य को महासुख के शीतल सरोवर में अवगाहन कराने का महत्वपूर्ण कार्य इन्होंने किया।”

रहस्यात्मक अनुभूति

प्रज्ञा और उपाय (करुणा) के मिलनोपरान्त प्राप्त महासुख को सिद्धों ने कई रुपकों में बताया है। इन्होंने रहस्यानुभूति को बताने के लिए नौका, वीणा, चूहा, हिरण आदि रूपकों का प्रयोग किया है। इसी व्याख्या में रवि, शशि, कमल, कुलिश, प्राण, अवधूत आदि तांत्रिक शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। डॉ. धर्मवीर भारती ने अपने शोध ग्रन्थ ‘सिद्ध साहित्य’ में सिद्धों की शब्दावली की दार्शनिक व्याख्या करके उसके आध्यात्मिक पक्ष को समझाया है।

श्रृंगार और शांत रस

श्रृंगार और शांत रस का बहुतायत प्रयोग किया गया है।

जनभाषा का प्रयोग

सिद्धों की रचनाओं में संस्कृत और अपभ्रंश दोनों मिलकर प्रयोग किए जाते हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा कहते हैं कि ये लोग आम लोगों की भाषा बोलते हैं। जब वे अपनी आम भाषा में बोलते हैं, तो उनकी भाषा कठिन हो जाती है। हरीप्रसाद शास्त्री ने सिद्धों की भाषा को “संधा-भाषा” कहा है। जैसे साँझ में चीजें स्पष्ट और अस्पष्ट दिखती हैं, भाषा भी स्पष्ट और अस्पष्ट अर्थ देती है। यह मत अधिक आम है।

छन्द प्रयोग

यद्यपि सिद्धों की अधिकांश रचना चर्या गीतों में हुई है, इसमें दोहा और चौपाई जैसे आम छन्द भी शामिल हैं। दोहा सिद्धों का बहुत प्रिय छन्द रहा है। उनकी रचनाओं में सोरठा और छप्पय भी शामिल हैं।

 

साहित्य के आदि रूप की प्रामाणिक सामग्री

हमारे साहित्य के मूल रूप की सामग्री सिद्ध साहित्य से प्राप्त होती है, इसलिए इसका महत्व बहुत अधिक है। तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य केवल चारण कालीन साहित्य में दिखाई देता है। लेकिन सिद्ध साहित्य शताब्दियों से चली आनेवाली धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का सही संकलन है।

 

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आदिकालीन नाथ साहित्य

 

नाथ साहित्य का जन्म सिद्ध साहित्य की गलतियों के खिलाफ हुआ। इसके बावजूद, इनका मूल भी बौद्धों की वज्रयान शाखा से है। नीरे मैथून का रूप देकर सिद्धों ने अपने स्वैराचार को समाज में ‘वाममार्ग’ की शरण दी थी। नाथ सम्प्रदाय ने योग-साधना को एक स्वस्थ उपाय के रूप में अपनाया और पुराने धार्मिक और सामाजिक जीवन में व्याप्त बुराई को दूर करने की कोशिश की। नाथ लोगों का मानना है कि इस विचार का जनक ‘आदिनाथ शिव’ था, लेकिन इस विचार को व्यवस्थित करने का सही श्रेय गोरखनाथ को दिया जाता है। गोरखनाथ ने सिद्ध सम्प्रदाय से इसे अलग कर नाथ सम्प्रदाय कहा।

नाथशब्द में से नाका अर्थ है अनादि रूपऔर का अर्थ है भूवनत्रय में स्थापित होना। इसप्रकार नाथशब्द का अर्थ है- वह अनादि धर्म, जो भूवनत्रय की स्थिति का कारण है।

दूसरी व्याख्या के अनुसार- नाथवह तत्व है, जो मोक्ष प्रदान करता है। नाथ ब्रह्म का उद्बोधन करता है, तथा अज्ञान का दमन करता है।

नाथ सम्प्रदाय में दीक्षित साधक ‘नाथ’ को परमतत्व मानकर योग साधना करते थे और अपने नाम के अंत में ‘नाथ’ उपाधि जोड़ते थे। नाथ शब्द ब्रह्म और सद्गुरू को भी बताता है। योगी अपनी अलग पोशाक पहनते हैं। प्रत्येक योगी एक विशेष तिथि को कान चिरखा कर एक मुद्रा कुंडल पहनता है। इनके सिर पर जटा, शरीर पर भस्म, कंठ में रूद्राक्ष की माला, हाथ में कमण्डल, कन्धे पर व्याघ्रचर्म और बगल में खप्पर रहता हैं।

नाथ सम्प्रदास में 9 नाथ आते हैं, जिनके नाम हैं-

  1. आदिनाथ (स्वयं – शिव),
  2. गोरखनाथ,
  3. मछेन्द्रनाथ,
  4. गहिणीनाथ,
  5. चर्पटनाथ,
  6. चौरंगीनाथ,
  7. जालंधरनाथ,
  8. भर्तृनाथ (भरथरीनाथ)
  9. गोपीचन्द नाथ

इन नाथों ने अपने समाज में भोग का त्याग, इन्द्रिय संयम, मनः साधना, प्राण साधना, कुण्डलिनी जागरण और योग साधना को अधिक महत्व दिया है। इनकी साधना में शील, संयम और शुद्धता का मूल स्वर था। इस सम्प्रदाय में इन्द्रिय निग्रह का विशेष महत्व है। इंद्रियों के लिए नारी सबसे बड़ा आकर्षण है, इसलिए इससे दूर रहने की शिक्षा दी गई है। गोरखनाथ ने शायद बौद्ध विहारों में भिक्षुओं के प्रवेश और उनके चरित्रिक पतन को देखा हो।

इस सम्प्रदाय में गुरू की कृपा से ही मुक्ति और निवृत्ति संभव होती है। इसलिए गुरु का खास महत्व है। कबीर और अन्य सन्तों की रचनाओं में नाथ पंथियों के प्रमुख सिद्धान्तों, जैसे इन्द्रिय-संगम, मनः साधना, हठयोग साधना आदि का प्रभाव देखा जा सकता है। संत साहित्य में गोरखनाथ आदि के पारिभाषिक शब्दों, प्रतीकों और खण्डन मण्डनात्मक शैली को अपनाया है।

नाथों की साधना-प्रणाली ‘हठयोग’ पर आधारित है। ‘ह’ का अर्थ सूर्य और ‘ठ’ का अर्थ चन्द्र बतलाया गया है। सूर्य और चन्द्र के योगों को हठयोग कहते है। यहाँ सूर्य इड़ा नाड़ी का और चन्द्र पिंगला नाड़ी का प्रतीक है। इस साधना पद्धति के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति कुण्डलिनी और प्राणशक्ति लेकर पैदा होता है। सामान्यतया कुण्डलिनी शक्ति सुषुप्त रहती है।

प्राणायाम करके साधक कुण्डलिनी को ऊर्ध्वमुख करता है। शरीर में छह चक्र हैं और तीन नाड़ियां हैं। योगी द्वारा प्रणयान में इड़ा पिंगला नामक श्वास मार्गों को बंद कर दिया, तो सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है। कुण्डलिनी शक्ति इसी नाड़ी से आगे बढ़ती है और छ:चक्रों को पार कर मस्तिष्क के निकट शून्यचक्र में पहुँचती है। योगी का सर्वोच्च उद्देश्य जीवात्मा को यहाँ पहुँचाना है। यही अवस्था परमानन्द ब्रह्मानुभूति है। यही हठयोग का अभ्यास है।

 

नाथ साहित्य की विशेषताएँ

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नाथ मत में शैववाद का दार्शनिक पक्ष है, जबकि हठयोग का व्यावहारिक पक्ष है। नाथों की रचनाओं में नैतिक आचरण, वैराग्य भाव, इन्द्रिय निग्रह, प्राण-साधना, मन-साधना और गुरु महिमा का उपदेश मिलता है। इन विषयों में नीति और साधना की व्यापकता और जीवन की अनुभूतियों का स्पष्ट चित्रण है। इस प्रकार, नाथ साहित्य में निम्नलिखित गुण पाए जा सकते हैं:-

 

चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास

नाथों ने धर्म और समाज में सिद्धों द्वारा फैलाई गई अहिंसा की विषवेलि को काटकर चारित्रिक दृढ़ता और मानसिक पवित्रता पर भर दिया। उन्हें नैतिक व्यवहार और मन की शुद्धता पर अधिक जोर दिया गया है। अपने अनुयाईयों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाया है। योगियों को भाँग, धतूरा आदि मादक पदार्थों से दूर रहना चाहिए। नारी का आकर्षण योग साधना में सबसे बड़ी बाधा होता है, इसलिए नारी से दूर रहने का उपदेश दिया गया है।

 

परम्परागत रूढ़ियों एवं बाह्यडम्बरों का विरोध

नाथों ने धार्मिक प्रणित बाह्यडम्बर और रूढ़ियों का खुलकर विरोध किया है। उनका मत है कि क्योंकि ब्रह्माण्ड पिण्ड में है, परमतत्त्व को बाहर खोजना व्यर्थ है। उस परमतत्व का अनुभव मन की शुद्धता और दृढ़ता के साथ हठयोग से किया जा सकता है। धर्मक्षेत्र में बाह्य डम्बर की जगह नहीं है। इसलिए नाथों ने मूर्तिपूजा, मुण्डन विशिष्ट वस्त्र पहनना, उँच-नीच, वेद पुराण पढ़ना आदि का विरोध किया है।

 

गुरू महिमा

नाथ सम्प्रदाय में गुरू का स्थान सर्वोपरि माना है। इसलिए गुरू-शिष्य परम्परा को नाथ सम्प्रदाय में अत्याधिक महत्व दिया जाता है। उनकी मान्यता है कि वैराग्यभाव का दृढ़ीकरण और त्रिविध साधना गुरु ज्ञान से ही संभव हो पाती है। गोरखनाथ ने कहा है कि गुरू ही आत्माब्रह्म से अवगत कराते है। गुरू से प्राप्त ज्ञान के प्रकाश में तीनों लोक का रहस्य प्रकट हो सकता है।

 

उलटबासियाँ

नाथों की साधना का क्रम निम्नलिखित है: इन्द्रिय निग्रह, प्राण साधना, तथा मन साधना। मनः साधना का अर्थ है मन को बाहर निकालकर अन्तःकरण की ओर निर्देशित करना। उलटबासी, मन की स्वाभाविक चाल है बाहरी जगत से बाहर जाना। नाथों ने अपनी साधना की अभिव्यक्ति के लिए उलटबासियों का प्रयोग किया है। उलटबासियाँ अद्भुत रस से भरपूर है, हालांकि यह कहीं-कहीं कठिन हो सकता है।

 

जनभाषा का परिष्कार

नाथ साहित्य ने आदिकालीन हिंदी को समृद्ध किया है। नाथों ने संस्कृत में बहुत कुछ लिखा है, लेकिन उन्होंने आम लोगों के लिए अपने विचार जन-भाषा में ही व्यक्त किए हैं। उनकी भाषा परंपरागत रूढ़ी विचारों से अलग है। शुक्लजी ने खड़ी बोली के कारण उनकी भाषा को राजस्थानी बताया है।

 

कुल मिलाकर, नाथ के साहित्य में स्वच्छन्द भाव और विचारों की सच्ची अभिव्यक्ति मिली है। नाथ साहित्य की देन को स्पष्ट करते हुए डॉ. रामकुमार वर्मा लिखते हैं-

“गोरखनाथ ने नाथ सम्प्रदाय को जिस आन्दोलन का रूप दिया वह भारतीय मनोवृत्ति के सर्वथा अनुकूल सिद्ध हुआ है उसमें जहाँ एक ओर ईश्वरवाद की निश्चित धारणा उपस्थित की गई, वहाँ दूसरी ओर विकृत करने वाली समस्त परम्परागत रूढ़ियों पर भी आघात किया। जीवन को अधिक से अधिक संयम और सदाचार के अनुशासन में रखकर आत्मिक अनुभूतियों के लिए सहज मार्ग की व्यवस्था करने का शक्तिशाली प्रयोग गोरखनाथ ने किया।”

 

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आदिकालीन जैन साहित्य

 

आदिकालीन साहित्य में जैन ग्रन्थ सबसे अधिक हैं। महावीर स्वामी जैन धर्म के प्रवर्तक थे। इन्हें छठी शताब्दी का माना जाता है। बौद्धों की तरह, इन्होंने भी दुनिया की पीड़ाओं पर बहुत ध्यान दिया। ये ‘जिन्न’ कहलाये क्योंकि वे सुख-दुःख के बंधनों पर विजय प्राप्त करते थे। जैन शब्द जिन्न शब्द से आया है। तीस वर्ष तक उन्होंने उपदेश दिया। महावीर जैन ने अहिंसा पर अधिक जोर दिया और देवपूजा का विरोध किया।

जैन धर्म में चार मूल सिद्धान्त हैं: अहिंसा, सत्य भाषण, अस्तेय और अनासक्ति। इसमें बाद में ब्रह्मचर्य भी शामिल हो गया। इस धर्म में कई विद्वान और साधक हुए। जिनकी संख्या 24 है। इन्होंने इस धर्म को बढ़ावा देने की कोशिश की। आगे चलकर जैन धर्म दो शाखाओं में बँट गया: दिगंबर और श्वेतांबर। जैन धर्म की इन दो शाखाओं ने धर्म को फैलाने के लिए साहित्य लिखा था, जो जैन साहित्य कहलाता है। दिगम्बर जैन साधुओं और कवियों का क्षेत्र दक्षिण भारत और मध्य भारत था, जबकि श्वेताम्बर जैन साधुओं और कवियों का क्षेत्र अधिकतर राजस्थान और गुजरात था।

यह जैन साहित्य, जो इन जैन मुनियों द्वारा अपभ्रंश में लिखा गया था, धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, साथ ही भाषा और साहित्य की वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हिन्दू धर्म से महावीर स्वामी का जैन धर्म अधिक समीप है। परमात्मा जैनों के यहाँ भी है, लेकिन वह सृष्टि का नियामक नहीं है, बल्कि मन और खुशी का स्रोत है। उसे दुनिया से कोई संबंध नहीं है। महानता और साधना से हर व्यक्ति परमात्मा बन सकता है।

परमात्मा से मिलने की कोई जरूरत नहीं है। जीवन के प्रति श्रद्धा जगाई गई और आचार की मजबूत भिति बनाई गई। जीवन में अहिंसा, करुणा, दया और त्याग का महत्व बताया। इन्द्रियों को नियंत्रित करने में नहीं, त्याग करने में कष्ट है। उन्होंने उपवास और व्रतों जैसे कर्मों पर आधारित साधना पर अधिक बल दिया और कर्मकाण्ड की कठिनाई को दूर करके ब्राह्मणों और शूद्रों को मुक्ति का समान भागी ठहराया।

जैन कवियों ने सदाचार के सिद्धान्तों को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए चरित काव्य, कथात्मक काव्य, रास, ग्रन्थ और उपदेशात्मक ग्रन्थ लिखे। कवियों का मुख्य उद्देश्य था कथाओं के माध्यम से शलाका पुरूषों के आदर्श चरित्र को दिखाना, लोगों को धार्मिक और चारित्रिक रूप से विकसित करना, सदाचार, अहिंसा, संयम जैसे गुणों का महत्व बताना और लोगों को इन गुणों को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करना।

जैन कवियों ने आचार, रास, पाश, चरित आदि विभिन्न शैलियों में लिखा है, लेकिन जैन साहित्य का सबसे अधिक लोकप्रिय रूप ‘रास’ ग्रन्थ है। वीरगाथा रासो से यह रास ग्रन्थ अलग है। रास गेयरुपक है। जैन मंदिरों में रात्रि में श्रावक रास गायन करते थे। इस रास में जैन तीर्थकारों की जीवनी, वैष्णव अवतारों की कहानियाँ और जैन आदर्शों का प्रदर्शन किया गया था। बाद में गेय काव्य को ‘रास काव्य’ कहा गया। जैन साधु शालिभद्र सूरि द्वारा लिखित “भरतेश्वर बाहुबली रास” हिन्दी में इस परम्परा को जन्म देता है।

जैन कवियों ने रामायण और महाभारत के कथानकों और कथाकारों को अपने धार्मिक मूल्यों के साँचे में ढालकर प्रस्तुत किया है। इन्होंने अपने सम्प्रदाय के महान लोगों के जीवन को भी काव्यबद्ध किया। इसके अलावा, यह लोककथाओं को काव्यात्मक रूप से प्रोत्साहित किया। मुनि रामसिंह (पाहुड दोहा) और योगिन्दु (परमात्मा प्रकाश) जैसे कवियों ने भी रहस्यात्मक काव्य लिखा। स्वयंभू, पुष्पदन्त और धनपाल जैन अपभ्रंश साहित्य के तीन प्रसिद्ध लेखक हैं । इन्होंने उत्कृष्ट साहित्य लिखा। देवसेन, जिनदत सुरि, हेमचन्द्र, हरिभद्र सूरि, सोमप्रभू सूरि, असरा कवि, जिन धर्म सूरि, विपनचन्द्र सूरि आदि इस सम्प्रदाय के प्रसिद्ध लेखक हैं।

स्वयंभू अपभ्रंश का सर्वश्रेष्ठ कवि महाकवि है। इन्हें आठवीं शताब्दी का बताया जाता है। इनके द्वारा चार कृतियाँ लिखी गई हैं। पदमचरित्र (पद्मचरित या रामचरित), रिट्ठनेमिचरित (अरिष्टनेमिचरित या हरिवंशपुराण), पंचमोचरित (नागकुमार चरित) और स्वयंभू छन्द। इसमें राम की कहानी है, जो उनकी कीर्ति का अधारस्तंभ है। इस पुस्तक के कारण इन्हे अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा जाता है।

स्वयंभू ने रामायण को पाँच खण्डों में लिखा है, जो वाल्मीकि रामायण से मिलते हैं। इन्होंने बालकाण्ड का नाम विद्याधर काण्ड रखा है और अरण्य तथा किष्किन्धा काण्ड को हटा दिया है। जैन धर्म को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने राम कथा में कुछ बदलाव और नए प्रसंग जोड़े हैं। स्वयंभू के राम, वाल्मीकि के राम की तरह, अपनी सभी मानवीय कमियों और शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। राम और सीता ने सीता के ‘अग्निपरीक्षा’ वाले प्रसंग में नारी के प्रति पुरुष मात्र का दृष्टिकोण बताया।

कवि ने सीता के चरित्र को उदार बनाया है। कवि ने रामकथा का अंत शांत रस से किया है और सभी पात्रों, जैसे राम, सीता और जनक, को जैन धर्म में दीक्षा लेते हुए दिखाया है। हरिवंशपुराण में बाईसवें जैन तीर्थकार अरिष्टनेमि और कृष्ण और कौरव पाण्डवों की कहानी है। कवि ने इसमें द्रौपदी का चरित्र बेहतरीन बनाया। कवि नारी चरित्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण है।

 

जैन साहित्य की सामान्य विशेषताएँ

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अपभ्रंश साहित्य के लेखक जैन आचार्य थे, इसलिए इसे जैन साहित्य कहा जाता है। जैन कवियों की रचनाओं में साहित्य और धर्म का मजबूत मिलाप दिखाई देता है। जैन कवि की रचनाएं पहले सरस काव्य बनती हैं जब वह साहित्य निर्माण करता है, लेकिन जब वह धर्मोपदेश की ओर रुख करता है, तो वे पद्यबद्ध धर्मोपदेशात्मक रचनाओं में बदल जाती हैं। इस उपदेशात्मक साहित्य में भारतीय जनजीवन के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू भी देखे जा सकते हैं। इस लेखन के कुछ आम लक्षण हैं:

उपदेश मूलकता

जैन साहित्य में प्रमुख प्रवृत्ति उपदेशात्मकता है, जिसके मूल में जैन धर्म के प्रति दृढ आस्था और उसका प्रचार है। इसके लिए जैन कवियों ने चरित नायकों, शलाका पुरूषों, आदर्श श्रावकों, तपस्वियों, पात्रों और आध्यात्मिक प्रेरक घटनाओं का वर्णन किया है। इसलिए, इस साहित्य में उपदेशात्मकता का स्वर प्रमुख है।

विषय की विविधता

जैन साहित्य धार्मिक साहित्य होने के बावजूद सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक विषयों के साथ ही लोक आख्यान की कई कथाओं को भी अपनाता है। जैन कवियों ने भी रामायण और महाभारत की कहानियों को बहुत कुशलता से अपनाया है। जैन साहित्य में लगभग सभी सामाजिक विषय शामिल हैं।

तत्कालीन स्थितियों का यथार्थ चित्रण

जैन कवि राजाओं के अधीन नहीं थे। इनकी रचनाएँ दरबारी अतिरंजना और राजाश्रय के दबाव से मुक्त हैं। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में तत्कालीन परिस्थितियों का वास्तविक चित्रण हुआ है यह लेख पुराने विचारों, समाज, धर्म, राजनीति आदि की सही परिस्थितियों को समझने में काफी सहायक हैं।

कर्मकाण्ड रूढ़ियों तथा परम्पराओं का विरोध

जैन अपभ्रंश कवियों ने बाह्य उपासना, पूजा-पाठ, शास्त्रीय ज्ञान, रूढ़ियों और परम्पराओं का तीव्र विरोध किया है, लेकिन उनके स्वर में कटुता या पाखंडता नहीं है। यह किसी भी मंदिर, तीर्थस्थल, शास्त्रीय ज्ञान, मूर्ति, वेष, जाति, वर्ण, मंत्र, तंत्र, योग या अन्य किसी भी संस्था को नहीं मानते। ये चारित्रिक शुद्धता या मन की शुद्धता को प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य मानते हैं। इन कवियों ने शुद्ध आत्मा पर बल दिया है, जब वे धन सम्पत्ति की क्षणिकता, विषयों की निन्दा, मानव देह की नश्वरता, संसार के संबंधों का मिथ्यापन आदि का वर्णन करते हैं।

आत्मानुभूति पर विश्वास

जैन कवियों ने आत्मानुभव को चरम प्राप्तव्य कहा है। और शरीर इसे बनाए रखता है। आत्मा को जानने के लिए शुभकर्मों को त्यागना चाहिए। आत्मा परमात्मा है। आत्मा मरने के बाद कुछ भी जानने के लिए नहीं रहती। आत्मानन्द का अर्थ सहजानन्द है। उन्हें अपने साधन-पथ की व्याख्या करने के लिए प्रेम भावना का प्रतीक प्रियतम की कल्पना का आश्रय मिला है। इस तरह, इन जैन कवियों ने भोग को त्याग दिया, शास्त्रज्ञान से आत्मज्ञान प्राप्त किया और कर्मकाण्ड से आत्मानुभूति को सर्वश्रेष्ठ बताया।

रहस्यवादी विचारधारा का समावेश

जैन कवियों की कुछ रचनाएँ रहस्यवादी विचारों से भरपूर हैं। कवियों में योगिन्द्र मुनि रामसिंह, सुत्रभाचार्य, महानन्दि महचय आदि शामिल हैं। इनकी साधना का मुख्य स्वर रहस्यवादी रचनाओं में बाह्य आचार, कर्मकाण्ड, तीर्थव्रत, मूर्ति का बहिष्कार, देवालय में ही ईश्वर की स्थिति बताना और अपने शरीर में स्थित परमात्मा की अनुभूति पाकर परम समाधि रूपी आनन्द प्राप्त करना है। यह आनन्द शरीर में स्थित परमात्मा गुरू (जिन गुरू) की कृपा से मिलता है।

काव्य रूपों में विविधता

जैन साहित्य काव्य रूपों में विविध है। रास, फागु, छप्पय, चतुष्पदिका, प्रबन्ध, गाथा, जम्नरी, गुर्वावली, गीत, स्तुति, माहात्म्य, उत्साह आदि इसमें शामिल हैं। जैन कवियों ने अपभ्रंश के कई काव्य रूपों का प्रयोग किया है, उनमें से अधिकांश काव्य रूप जैन साहित्य को प्राप्त हैं।

शांत या निर्वेद रस का प्राधान्य

जैन साहित्य में करुण, वीर, श्रृंगार, शांत आदि सभी रसों का प्रभावशाली प्रदर्शन हुआ है। ‘नेमिचन्द चउपई’ में करुण, भरतेश्वर बाहुबली रास में वीर तथा श्रीस्थूलिभद्र फागु में श्रृगार में सभी रसों की सफल निष्पत्ति होती है, लेकिन अंत में शांत या निर्वेद सभी रसों पर हावी होता है। यही कारण है कि जैन साहित्य में रसराज शांत या निर्वेद है।

प्रेम के विविध रूपों का चित्रण

जैन अपभ्रंश साहित्य में प्रेम के पाँच रूप हैं: विवाह के लिए प्रेम, विवाह के बाद प्रेम, असामाजिक प्रेम, रोमांटिक प्रेम और विषम प्रेम। ‘करकंडुचरिउ’ प्रथम प्रेम का चित्रण है। ‘पउमासिरिचरिउ’ में समुद्र और पद्मश्री का प्रेमपूर्ण विवाह दूसरे प्रकार का प्रेम का उदाहरण है। जसहरचरिउ में रानी अमृतमयी का कुबड़ा से प्रेम असामाजिक है। ‘पउमचरिउ’ में रावण का प्रेम प्रेम की विषमता का सबसे बड़ा उदाहरण है, लेकिन रोमांटिक प्रेम ही इस साहित्य में अधिक प्रकट हुआ है। इसके दो कारण हैं: पहला सामंतवादी है क्योंकि बहुपत्नी प्रथा इस युग में प्रचलित थी; दूसरा धर्म की महिमा बताने के लिए है।

गीत तत्व की प्रधानता

जैन कवियों की रचनाएँ शैली, स्वरूप और उद्देश्य की दृष्टि से काव्य से अधिक गीत की तरह हैं। यह भी स्वाभाविक है, क्योंकि गेयता इस युग की सर्वव्यापी विशेषता थी। जैन कवियों द्वारा प्रयुक्त छन्दों में गेयता और लय का ध्यान रखा गया है। इस काव्य में मंगलाचरण के अलावा स्तुति और वंदना भी आवश्यक हैं। पुष्पदन्त और स्वयंभू ने छंदों में संगीत का पुट दिया है। कड़वक के छन्द क्रमशः संगीत के स्वर और वाद्यों की लय पर चलते हैं।

अलंकार – योजना

जैन साहित्य में अर्थालन्कार और शब्दालन्कार दोनों प्रयोग किए गए हैं, लेकिन अर्थालन्कार अधिक महत्वपूर्ण है। अर्थालन्कारों ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यक्तिरेक, उल्लेख, अनन्वय, निदर्शना, विरोधाभास, स्वभावोक्ति, भ्रान्ति, सन्देह आदि शब्दों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है। अधिकांश जैन कवि उपमान का उपयोग करते हैं। शब्दालन्कारों में अनेक श्लेष, यमक और अनुप्रास हैं।

छन्द-विधान

जैन काव्य छन्द से भरपूर है। स्वयंभू द्वारा लिखित ‘स्वयंभूछन्द’ और हेमचन्द्र द्वारा लिखित ‘छन्दोनुशासन’ दोनों पुस्तकों में छन्दों का व्यापक विश्लेषण किया गया है। जैन साहित्य में कड़वक, पट्पदी, चतुष्पदी, धत्ता बदतक, अहिल्य, बिलसिनी, स्कन्दक, दुबई, रासा, दोहा, उल्लाला सोरठा, चउपद्य आदि छन्दों का प्रयोग होता है।

लोकभाषा की प्रतिष्ठा

जैन साधु नगर-नगर घूमकर धर्म-प्रचार करते थे, इसलिए उन्होंने लोकभाषा का प्रयोग किया और उसे सम्मान दिया।

 

संदर्भ ग्रंथ:-

  1. हिन्दी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  2. हिन्दी साहित्य का इतिहास- सं. डॉ. नगेन्द्र
  3. हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास- आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी
  4. हिन्दी साहित्य का आदिकाल- आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी
  5. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ- डॉ. शिवकुमार शर्मा
  6. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास- डॉ. रामकुमार वर्मा
  7. हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास- डॉ. गणपति चंद्र गुप्त
  8. हिन्दी साहित्य का इतिहास- डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय
  9. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास- डॉ. बच्चन सिंह
  10. आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास- डॉ. बच्चन सिंह

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